
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव अब दहलीज पर खड़ा है। एक तरफ टीएमसी और बीजेपी सत्ता की सीधी लड़ाई में आमने-सामने हैं, तो दूसरी तरफ कांग्रेस अभी तक यह तय नहीं कर पाई है कि मैदान में किस अवतार में उतरे।
गठबंधन या एकला चलो? यही सवाल इस वक्त कांग्रेस के बंगाल यूनिट से लेकर दिल्ली दरबार तक गूंज रहा है।
चुनावी मोड में TMC और BJP, कांग्रेस अब भी कंफ्यूज
टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी और सांसद अभिषेक बनर्जी पूरी तरह चुनावी मोड में आ चुके हैं। अभिषेक बनर्जी ने हाल ही में एक हाई-प्रोफाइल रैली कर बीजेपी पर सीधा हमला बोला।
वहीं बीजेपी की ओर से केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने मोर्चा संभाल रखा है। शाह का हालिया बंगाल दौरा और कोलकाता में की गई प्रेस कॉन्फ्रेंस ने साफ कर दिया है कि बीजेपी इस चुनाव को लेकर नो रिस्क मूड में नहीं है।
कांग्रेस के सामने 3 विकल्प, लेकिन एक राय नहीं
कांग्रेस इस वक्त रणनीतिक चौराहे पर खड़ी है। पार्टी के सामने तीन विकल्प हैं—और तीनों पर पार्टी भीतर से बंटी हुई है।
TMC के साथ गठबंधन
टीएमसी के साथ गठबंधन कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा, लेकिन सबसे मुश्किल विकल्प है। 2024 लोकसभा चुनाव में टीएमसी ने कांग्रेस को सिर्फ दो सीटों का ऑफर दिया था, जिससे कांग्रेस नाराज़ हो गई और उसने लेफ्ट के साथ तालमेल किया।
हालांकि टीएमसी का कहना है कि वह INDIA गठबंधन का हिस्सा बनी रहेगी। अभिषेक बनर्जी साफ कर चुके हैं कि बीजेपी से लड़ने के लिए उन्हें कांग्रेस की जरूरत नहीं, लेकिन अल्पसंख्यक वोटों के गणित में कांग्रेस उपयोगी हो सकती है—वो भी टीएमसी की शर्तों पर।
एकला चलो रे
बंगाल कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार का मानना है कि लेफ्ट अब बंगाल में कमजोर हो चुका है। उनके मुताबिक कांग्रेस को “अकेले लड़कर पहले बीजेपी से मुख्य विपक्षी दल का दर्जा छीनना चाहिए।”

यानी टैगोर की पंक्ति— “यदि तुम्हारी पुकार सुनकर कोई न आए, तो अकेले ही चलो” को सियासी जमीन पर उतारने की तैयारी।
लेफ्ट के साथ गठबंधन
पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी, जो ममता बनर्जी के कट्टर आलोचक हैं, चाहते हैं कि कांग्रेस लेफ्ट के साथ मिलकर ममता और बीजेपी—दोनों पर बराबर हमला करे।
हालांकि सच्चाई यह भी है कि पिछले विधानसभा चुनाव में यही गठबंधन खाता भी नहीं खोल पाया था। अधीर रंजन चौधरी का बयान भी रणनीतिक चुप्पी की ओर इशारा करता है—“चुनाव में उतरेंगे तो वोटर से क्या कहेंगे, तब सुनिएगा।”
फैसले में देरी, नुकसान तय?
कांग्रेस आलाकमान सभी पक्षों की राय सुन चुका है, लेकिन अब तक अंतिम फैसला लंबित है। बंगाल में इसी साल चुनाव होने हैं और ऐसे में देरी का सीधा फायदा टीएमसी और बीजेपी दोनों को मिल सकता है।
राजनीतिक जानकारों की राय साफ है— “रणनीति जितनी देर से बनेगी, नुकसान उतना ही पक्का होगा।”
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस पार्टी रणनीतिक असमंजस में है। पार्टी के सामने टीएमसी के साथ गठबंधन, लेफ्ट के साथ तालमेल या अकेले चुनाव लड़ने के तीन विकल्प मौजूद हैं। हालांकि इन तीनों विकल्पों को लेकर पार्टी के भीतर एकमत नहीं बन पाया है। चुनाव नजदीक होने के कारण कांग्रेस नेतृत्व पर जल्द फैसला लेने का दबाव बढ़ता जा रहा है।
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